सत्ता तुम्हारी भगवन् जग में समा रही है।

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सत्ता तुम्हारी भगवन् जग में समा रही है।

सत्ता तुम्हारी भगवन् जग में समा रही है।
तेरी दया सुगन्धि हर गुल से आ रही है।।1।।

रवि, चन्द्र और तारे, तूने बनाये सारे।
इन सबमें ज्योति तेरी, इक जगमगा रही है।।2।।
सत्ता तुम्हारी भगवन, जग में…….

विस्तृत वसुन्धरा पर सागर बहाये तूने।
वह जिनकी मोतियों से, अब चमचमा रही है।।3।।
सत्ता तुम्हारी भगवन, जग में……

दिन-रात, प्रातः सायं मध्यान्ह भी बनाये।
हर ऋतु पलट-पलट कर करतब दिखा रही है।।4।।
सत्ता तुम्हारी भगवन, जग में……

सुन्दर सुगन्धि वाले, पुष्पों में रंग है तेरा।
यह ध्यान फूल-पत्ती, तेरा दिला रही है।।5।।
सत्ता तुम्हारी भगवन, जग में…….

हे ब्रह्म विश्व कर्ता, वर्णन हो तेरा कैसे।
जल-थल में तेरी महिमा, हे ईश। छा रही है।।6।।
सत्ता तुम्हारी भगवन, जग में…….