शिखरिणी छन्दः
क्वचिद् भूमौ शय्या क्वचिदपि च पर्यङ्कशयनं,
क्वचिच्छाकाहारी क्वचिदपि च शाल्योदनरुचिः।
क्वचित्कन्थाधारी क्वचिदपि च दिव्याम्बरधरो,
मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुःखं न सुखम्।।
(भर्तृहरिकृत- नीतिशतक, श्लो. ७७)
भावार्थ- कभी सुन्दर शय्याओं पर शयन करते हैं तो कभी भूमि पर ही सो जाते हैं। कभी अच्छे-अच्छे स्वादिष्ट पकवानों का आनन्द लेते हैं तो कभी शाक-पात खाकर ही निर्वाह कर लेते हैं। कभी सुन्दर वस्त्रों को धारण करते हैं, तो कभी गुदड़ी से ही शरीर को ढक लेते हैं। विचारशील- विवेकी व्यक्ति अपने लक्ष्य की ओर से ही दृष्टि रखे होते हैं, मार्ग में आने वाले सुख-दुःख की परवाह नहीं किया करते।
























