गंगातीरे हिमगिरिशिला-बद्धपद्मासनस्य
गंगातीरे हिमगिरिशिला-बद्धपद्मासनस्य,
ब्रह्मध्यानाभ्यसनविधिना योगनिद्रां गतस्य।
किं तैर्भाव्यं मम सुदिवसैर्यत्र ते निर्विशंकाः,
कण्डूयन्ते जरठहरिणाः स्वांगमंगे मदीये।।
(भर्तृहरिकृत- नीतिशतक, श्लो. ३७)
भावार्थ- प्राचीन काल में लोगों का जीवन, लक्ष्य तथा चिन्तन आज से सर्वथा भिन्न होता था। उस समय व्यक्ति विचारता था किद्ध मेरे ऐसे सुदिनों से बढ़कर और क्या दिन होंगे, जब मैं गंगा के किनारे, हिमालय पर्वत की किसी शिला पर, पद्मासन लगाकर, योग की क्रियाओं के अनुष्ठान पूर्वक ब्रह्म के स्वरूप का ध्यान करते हुए समाधि में लीन हो जाऊंगा और बूढ़े हिरण निर्भयता पूर्वक मेरे शरीर से अपने शरीर को खुजाने का आनन्द लेंगे।
























