वसन्ततिलका छन्दः
मत्तेभकुम्भदलने भुवि सन्तिः शूराः,
केचित् प्रचण्ड-मृगराज-वधेऽपि दक्षाः।
किन्तु ब्रवीमि बलिनां पुरतः प्रसह्य,
कन्दर्पदर्पदलने विरला मनुष्याः।।
(भर्तुहरिकृत- नीतिशतक, श्लो.५८)
भावार्थ- मैं मानता हूं कि संसार में, उन्मत्त हाथियों के सिर को फोड़ने वाले वीर बहुत बड़ी संख्या में हैं। क्रोध से भरे हुए अत्यन्त उग्र सिंहों को देखते ही चुटकी में मार डालने वाले वीर भी बहुत हैं, किन्तु मैं ऐसे बलवानों के सामने साहसपूर्वक कहता हूं कि काम वासना की प्रबल ज्वाला को रोककर, इन्द्रियजित वीर उनमें कोई विरला ही मनुष्य होगा।
























