आर्य कहलाते आप
आर्य कहलाते आप, नियम निभाते नहीं,
आर्य फिर कैसे सारे विश्व को बनाओगे ।
ब्रह्म-देव-आदि पंच यज्ञ न करोगे यदि,
कैसे त्रय ताप तोप निधि तर जाओगे ।
भिन्नता भरी है भाइयों में भरपूर जब,
प्रेम का पीयूष कैसे घर को पिलाओगे।
ऋषि के बताये हुए कार्य जो करोगे नहीं,
भला ऋषि ऋण को उतार कैसे पाओगे ।।
























