ईश्वर को मानते हैं
ईश्वर को मानते हैं लोग जानते नहीं।
मृत्यु को जानते हैं मगर मानते नहीं।
कैसा अंधेर है यह कि छोटी सी बात की,
असलियत जानते हुए भी जानते नहीं
दुनिया को लूटते हैं बड़े इल्मो हुनर से,
चादर फरेब की ये कभी तानते नहीं।
तिनका किसी की आँख का देखें ये बार-बार,
अपनी में हो शहतीर भी तो मानते नहीं।
सच्चाई जिन्दगी में भूलकर न आ सकी,
कहने को कभी झूठ ये बखानते नहीं।
मतलब पड़े तो लोग इर्द गिर्द घूमते,
जब वक्त निकल जाए तो पहचानते नहीं।
बस एक ही को जानकर उसी के हो गए,
दर-दर की खाक हम तो ‘पथिक’ छानते नहीं।
























