त्वं तमग्ने अमृतत्व उत्तमे मर्त दधासि श्रवसे दिवेदिवे ।
यस्तातृषाण उभयाय जन्मने मयः कृणोषि प्रय आ च सूरये
॥७॥ ऋः १. ३१.७
तर्जः मुत्तम पविड़वुम मुगिगळिल केवियुमा।
उत्तम प्रभु-शरण, मिलती है प्रेरणा
परलोक लोक सुख, पड़ता है हेरना
स्वाध्याय में लगे ये मन, सुखानन्द को खेवना॥
॥उत्तम प्रभुशरण ॥
अधिनियम सुख-दुःख का, प्रतिफल है कर्म का,
विरला ही मर्म जाने, आत्मा के धर्म का
ज्ञानी भेद को खोले, माने जो, सो बोले
प्रभु उसे करता प्रतिपन्न॥
॥उत्तम प्रभुशरण॥
आत्मा की नित्यता और उसके हैं जन्म अनेक
जिसको ये भान होता बने वो सदा सुचेत
पाप कर्म वो छोड़े
पुण्य से नाता जोड़े
पुरुषार्थी बनता अनुपम॥
॥उत्तम प्रभुशरण ॥
आत्म-चिन्तन में, साधक स्वाध्याय करते हैं नित
बनता है भक्त सूरि करते प्रभु आकर्षित
आनन्द सुख से डोले, परमेश्वर का हो ले
यही मोक्ष-प्राप्ति-साधन ॥
॥उत्तम प्रभुशरण ॥
लोक की कर ना उपेक्षा, परलोक जाये सुधर
स्वार्थपरायण ना हो, पापाचरण ना तू कर
उन्नतियाँ दोनों ले, प्रभु-कृपा भरे झोले
नित कर प्रभु आवाहन॥
॥ उत्तम प्रभुशरण॥
(अधिनियम) सच्चे नियम। (सूरि) विद्वान। (प्रतिपन्न) परिपूर्ण।










