गगन में तार जोड़ने वाला

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आ पप्रो पार्थिव रजो वद्वघे रोचना दिवि।

न त्वावाँ इन्द्र कश्चन न जातो न जनिष्यतेऽ विश्व ववक्षिय

।। ऋः १.८१.५

तर्जः मुक्या हुदं क्य बेगाणे कुणाल

महत्ता तुम्हारी भला कैसे समझ पायें
कलाकार तुमसा न है कोई, वेद बतायें
तुम्हीं ने पदार्थ बहुमूल्य रच के (2)
ये द्युः पृथिवी लोक सजाये ॥
॥ महत्ता

पवन मिट्टी पानी अमोलक पदार्थ
बिना इसके रहता ये जीवन अकारथ
सुमन रहते सुरमित, ये तरुओं के साये
विविध अन्न औषधि धरती पे प्रभु उपजाये ॥
॥ महत्ता

यहाँ सोना-चाँदी लोहा हीरक है
खनिज-कोयला और गंधक नमक है
उदधि सीपियों मोतीयों से भरे हैं
कषाय मधुर अम्ल कटु-रस दिलाये ॥
॥ महत्ता

ये ग्रह सूर्य-चन्द्र झिलमिल सितारे
प्रकाशित ही रहते प्रभु के सहारे
ये पार्थिव कर्तृव्य भुलाया न जाये
कलावित-प्रभु की महिमा कहाँ तक गिनायें।॥
॥ महत्ता

तू ही ब्रह्मा, विष्णु है, यमकाल, शिव है
अनेकों हैं गुण जिससे जग अनुशासित है
तो फिर क्यों जगत तुझको टुकड़ों में बाँटे?
तेरे नाम की आड़ लेकर कलह क्यों मचायें।
॥ महत्ता

(अकारथ) व्यर्थ, असार। (सुरभित) सुगन्धित, श्रेष्ठ। (खनिज) खान। (उदधि) समुद्र
सागर। (कषाय) सुगन्धित, कसैला। (अम्ल) खट्टा। (कटु) कड़वा। (पार्थिव) भूमि
सम्बन्धित। (कर्तृत्व) प्रबन्ध, व्यवस्था, योजना। (कलावित) कला को जानने वाला।
(अनुशासित) संयमित ।