एक बार हरी बोलो मन रसना

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एक बार हरी बोलो मन रसना (1)
मानव देहार गोईरब कोइरोह ना
(एक बार हरी बोलो मन रसना,
मानव देह का अभिमान मत करो)

मानव देहा माटिरेर भाण्ड
भाङ्गिले होइवे खण्ड रे खण्ड
भाङ्गिले देहा जोरा निवे ना
एक बार हरी बोलो मन रसना
मानव देहार गोईरब कोइरोह ना
(मानव देह मिट्टी का भांडा=पात्र=बर्तन है,
यदि टूट जाएगा तो हो जाएगा खण्ड खण्ड,
टूटे हुए शरीर को जोड़ा नहीं जा सकता
अतः एक बार हरी बोलो मन रसना,
मानव देह का अभिमान मत करो)

टाका पईसा भिटा वारी
जीवन गेले सब रहवेर परी
सङगेर साथि केउतोर हवे ना
एक बार हरी बोलो मन रसना
मानव देहार गोईरब कोइरोह ना
(रुपए-पैसे, धन-सम्पत्ति-मकान आदि
सब जीवन चले जाने के बाद सब यहीं
रह जाता है, कोइ भी साथी तुम्हारे साथ
नहीं रह जाता है अतः एक बार हरी बोलो
मन रसना, मानव देह का अभिमान मत करो)

वेला डुबिले हवेर रात्रि
सङ्गे नाई मोर सङगेर साथि
के भव नदी केमने हव पार
एक बार हरि बोल मन बारे बार
वेला डुबिले होइवेर अन्धोकार
(शाम की वेला डूबेगी और रात्रि हो जाएगी
ऐसे में तुम्हारे सङ्ग कोइ नहीं होगा,
फिर तुम भव-सागर/नदी को
कैसे पार करोगे ?
अतः एक बार हरी बोलो मन रसना,
मानव देह का अभिमान मत करो)

एक बार हरी बोलो मन रसना
मानव देहार गोईरब कोइरोह ना
(एक बार हरी बोलो मन रसना,
मानव देह का अभिमान मत करो)