क्षण भंगुर जीवन की कलिका।
क्षण भंगुर जीवन की कलिका।
कल प्रातः को जाने, खिली न खिली।।
मलयाचल की शुचि शीतल,
मन्द सुगन्ध समीर, चली न चली।।
कर काल कुठार लिए फिरता,
तन नम्र से चोट, झिली न झिली ।।
जपले प्रभु नाम अरी रसना,
फिर अन्त समय में, हिली न हिली।
क्षण भंगुर जीवन की कलिका।
क्षण भंगुर जीवन की कलिका।
कल प्रातः को जाने, खिली न खिली।।
मलयाचल की शुचि शीतल,
मन्द सुगन्ध समीर, चली न चली।।
कर काल कुठार लिए फिरता,
तन नम्र से चोट, झिली न झिली ।।
जपले प्रभु नाम अरी रसना,
फिर अन्त समय में, हिली न हिली।
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