जन्म जन्म के चक्कर खा कर हीरा जीवन मिलता है ।
“तर्ज़ – नमस्कार भगवान् तुम्हें ।
जन्म जन्म के चक्कर खा कर हीरा जीवन मिलता है ।
शुभ कर्मों के फल स्वरूप यह फूल चमन में खिलता है ।
शुभ कर्मों के फल स्वरूप . . .
अजर अजन्मा अमर जीव का नर तन उत्तम चोला है ।
उपलब्धि का आज तलक नहीं भेद किसी ने खोला है ।
न तो कहीं यह मोल बिके और न दरज़ी से सिलता है । ।
शुभ कर्मों के फल स्वरूप . . . . . . . . . . . १
सृष्टि के अनमोल पदार्थ जो भगवान् बनाता है ।
वही कुशल कारीगर ही इस चोले का निर्माता है ।
जिस की मर्जी बिना जगत् में पत्ता तक नहीं हिलता है ।
शुभ कर्मों के फल स्वरूप . . . . . . . . . . . २
कुन्दन बनता है सोना जब इसको आग तपाती है ।
छेनी से छिल कर हीरे की चमक और बढ़ जाती है । ।
प्रभु मिले तो हँस कर झेलो जितना संकट झिलता है ।
शुभ कर्मों के फल स्वरूप . . . . . . . . . . .३
सदा जवानी नहीं रहेगी ले शुभ कर्म कमा प्यारे ।
तन के पुर्जे ढीले होंगे समय न व्यर्थ गँवा प्यारे ।
‘ पथिक ‘ आख़री पहर में जीवन ठेले से नहीं मिलता है ।
शुभ कर्मों के फल स्वरूप . . . . . . . . . . . ४”










