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एस.राधाकृष्णन के चिंतन पर स्वामी सत्यप्रकाश का दृष्टिक्षेप ——————————————————————-
महर्षि दयानंद ने यह कभी नहीं कहा कि उन्होंने किसी नवीन सिद्धांत का प्रतिपादन किया है ! वे वेदों के सिद्धांतों पर अडिग हैं और यह भी कोई नवीनता नहीं ! जैसा कि वे “स्वमंतव्यामंतव्य प्रकाश:” में ‘ब्रह्मा से लेकर जैमिनि मुनि पर्यंन्तों’ का उल्लेख करते हैं,ये सब महान ऋषिगण वेदों की सर्वोच्चता को स्वीकार करते आए हैं! ज्ञान एवं सत्य के विषयों पर सायण, रामानुज, मध्वाचार्य आदि परवर्ती विचारकों ने भी वेदों की सर्वोच्चता पर कभी शंका नहीं की! हां, कुछ आधुनिक व्याख्याकारों ने इस तथ्य की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया कि बड़े-बड़े ब्रह्म-विचारकों ने भी वेदों के प्रामाण्य को नहीं छोड़ा है ! प्राचीन ऋषियों की वेदनिष्ठा को समझाने में डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे महानुभाव से भी अंग्रेजी अनुवादों पर निर्भर रहने की भूल हो गई है ! उदाहरणार्थ- वे अपनी पुस्तक ‘इंडियन फिलासफी’ भाग 2 पृष्ठ 20-21 वर्ष 1927 में षड्दर्शन विषय पर लिखते हैं –

” वेदों की सर्वोच्चता मानने से ये छः दर्शन वैदिक दर्शन ही हैं! जो दर्शन वेदों को प्रमाण मानते हैं वह आस्तिक और जो ऐसा नहीं मानते वे नास्तिक दर्शन कहलाते हैं ! किसी दर्शन का आस्तिक नास्तिक होना इस पर निर्भर नहीं है कि वह ईश्वर- विश्वासी है या नहीं अपितु इस पर निर्भर है कि वह वेद-विश्वासी है या नहीं ! बौद्ध मत की शाखाएं उपनिषदों से प्रेरित होने पर भी वेदों को प्रमाण न मानने के कारण आस्तिक नहीं कहलातीं !

” वेदों की स्वीकार्यता का अभिप्राय है यह सचमुच मान लेना कि इन विषयों में बौद्धिक तर्क से आध्यात्मिक अनुभूति अधिक निर्णायक है ! वेदों की स्वीकार्यता का यह अर्थ नहीं की वेद के सभी सिद्धांतों को पूर्णतः स्वीकार कर लिया अथवा ईश्वर अस्तित्व के विश्वास को मान लिया है! इसका केवल इतना अर्थ है कि अस्तित्व के रहस्य के उद्घाटन का गंभीर प्रयास किया! वेदों की निरपेक्षता भी तो छ: दर्शनों में एक सी मान्य नहीं हैं! जैसा कि हम आगे देखेंगे वैशेषिक और न्याय दर्शन ईश्वर को अनुमान प्रमाण से मानते हैं ! सांख्य दर्शन ईश्वर वादी नहीं है! योग दर्शन वेद से स्वतंत्र है ! पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा अवश्य वेदों पर आधृत हैं! पूर्व मीमांसा में ‘देवता’ की अवधारणा तो वेदों से ली है किंतु ईश्वर विषय पर विशेष विचार नहीं किया है! उत्तर मीमांसा ईश्वर को श्रुति और अनुमान प्रमाणों से स्वीकार करता है जबकि ईश्वर का साक्षात्कार ज्ञान और ध्यान से संभव है! कुछ परवर्ती आस्तिक विचारकों ने सांख्य को आस्तिक दर्शन नहीं माना है !

” शास्त्र का दार्शनिक स्वरूप वेद की स्वीकार्यता से निर्मित नहीं होता ! श्रुति और स्मृति का भेद जग जाहिर है और दोनों में भिन्नता होने पर श्रुति को प्रमाण माना जाता है! श्रुति भी कर्मकांड (वेद संहिताएं एवं ब्राह्मण ग्रंथ ) और ज्ञान कांड (उपनिषद) में विभक्त है ! इनमें उपनिषदों का महत्व अधिक है! यद्यपि इनमें से अधिकांश को अर्थवाद या अनावश्यक कथन कह कर अस्वीकार कर दिया जाता है! ये भेद-उपभेद मनुष्य की वेद-प्रामाण्य की भावना को हल्का कर देते हैं ! वेद मंत्रों की व्याख्याएं व्याख्याकारों के दार्शनिक रुझान पर निर्भर हैं !इन व्याख्याकारों की उत्कंठा तार्किक प्रणाली से तर्कसंगत निष्कर्ष निकालते समय भी प्राचीन अर्थों के साथ तारतम्यता बनाए रखने में रही! उन्होंने बिल्कुल नया प्रतिपादित करने की इच्छा ही नहीं की! उनमें स्पष्ट कथन की कमी रही जिससे पूर्व मान्य शक्ति का ही प्रचार होता रहा !”

👉❌👆 उपर्युक्त कथन से अधिक गलत प्रस्तुति कुछ नहीं हो सकती !

👉✅ वेदों की निरपेक्षता में छहों शास्त्रों का विश्वास संदेह से परे है! उन्होंने वेदों के आश्रय का निर्णय प्राचीन ग्रंथो के साथ तारतम्यता बनाए रखने के उद्देश्य मात्र से नहीं किया! उन्होंने न तो वेदों के प्रामाण्य को हल्के में लिया और न ही वेदों का अर्थ अपने रुझान के अनुसार किया! स्पष्टता की कमी का आरोपण करना तो सत्य को तोड़ने-मरोड़ने और अ-दार्शनिक बात करने जैसा है ! जो दर्शनकार सत्य भाषण के प्रति कटिबद्ध थे और जिनमें सत्यान्वेषण की उत्कंठा थी, उन्होंने वेदों की सर्वोच्चता को सम्यक परीक्षा किए बिना हल्के में नहीं मान लिया होगा ! जो दर्शनकार ब्रह्म और आत्मा के अस्तित्व पर वाद-प्रतिवाद हेतु प्रस्तुत हों, जो अधिकांश मौलिक समस्याओं के प्रामाणिक परीक्षण को सदा उद्यत हों, जिनका सभी विचारणीय विषयों पर स्पष्ट दृष्टिकोण रहा हो, तथा जिन्होंने किसी तर्क को बाल की खाल निकालने से शेष न छोड़ा हो, उनसे यह अपेक्षा कैसे हो सकती है कि वह वेदों की निरपेक्षता को बिना परिणाम सोचे स्वीकार कर लेंगे! क्या वेदों की निरपेक्षता में विश्वास रखना केवल लोकप्रियता के लिए अथवा इस विचार से हो सकता है कि यह उनके पूर्व मान्य सत्य के प्रचार में सहायक होगा ? यह सब विश्वास करना कठिन है ! प्राचीन ऋषियों के विश्वास और निष्कर्ष भिन्न हो सकते हैं, किंतु वे अपनी अभिव्यक्ति में स्पष्ट थे! वेदों की स्वीकार्यता का अर्थ वेद के सभी सिद्धांतों की पूर्ण स्वीकारोक्ति न बताना क्या टिप्पणीकार का रुझान नहीं है? आखिर ऐसा निष्कर्ष कैसे निकाल लिया गया ? क्या उन्हें कोई ऐसा दृष्टांत मिला है जिसमें किसी दर्शनकार ने वेदों से ज्ञान- विचार पूर्वक असहमति जताई हो? यह अलग बात है कि उनके मध्य किसी व्याख्या विशेष पर मतभेद हो किंतु जहां तक वेदों की निरपेक्षता की मान्यता का सिद्धांत है, उन्होंने इस पर कहीं कोई असहमति नहीं जतायी! दर्शन -सूत्रों में कहीं नहीं मिलता कि दर्शनकार ने उस सत्य में विश्वास व्यक्त किया हो जो श्रुति के विरुद्ध है !

वेदों की सर्वोच्चता पर यही कहना है कि ये असंदिग्ध है! इसमें इतना ही कहेंगे कि इस विषय पर छहों वैदिक दर्शन एक हैं !
👉सांख्य दर्शन ने वेद के स्वत: प्रमाणत्व की चर्चा अपने ढंग से की है!
👉पूर्व मीमांसा ने शब्द के नित्यत्व पर विचार किया है !
👉 वैशेषिक दर्शन में आम्नाय अर्थात् वेद के प्रमाणत्व का उल्लेख है!
👉न्याय दर्शन ने शब्द प्रमाण के साथ-साथ इस विषय को भी तार्किक शैली में विस्तार से रखा है !
👉 वेदांत दर्शन अर्थात् उत्तर मीमांसा के अनुसार वेद ईश्वरकृत ज्ञान है!
👉महर्षि पतंजलि जब कहते हैं- ” स एष पूर्वेषामपि गुरु: कालेनानवच्छेदात् ” तब उनका यही आशय है कि वेद का आविर्भाव ईश्वर के निमित्त से सृष्टि के आदि में हुआ है !

स्रोत- स्वामी दयानन्द का वैदिक दर्शन
लेखक- स्वामी (डॉ०) सत्यप्रकाश सरस्वती
प्रस्तुतकर्ता – रामयतन