ऊँची ऊँची पहाड़ों की चट्टानों को तोड़ के।

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ऊँची ऊँची पहाड़ों की चट्टानों को तोड़ के।

ऊँची ऊँची पहाड़ों की
चट्टानों को तोड़ के।
चढ़ जाते हैं आर्यवीर
बहादुर दौड़ दौड़ के ।। टेक ।।


चार वेद, मनुस्मृति,
ऋषियों का ये कहना है।
सीने ऊपर चोट लेना
क्षत्रियों का गहना है।


रहना है अगर शान से
आ दुश्मन को मरोड़ के।
टूटे हुए आयामों के टुकड़े
जोड़-जोड़ के ।। १ ।।

बारह साल पेट भरके
रोटी तक ना खाई थी।
अकबर के दरबार बीच
गरदन ना झुकाई थी।


महारावल के चित्तौड़ के,
शाही नहीं लगाई थी।
आखिर मुगल सेना भागी
घाटी छोड़-छोड़ के ।। २।।

इकला था वो वीर कुछ कर
ना उसका हजार सके ।
अनेकों ही हिन्दू मुस्लिम
बदला नहीं तार सके ।


चोट नहीं मार सके उस
अमरसिंह राठौर के ।
इतिहासों के अन्दर लगा
दाग ‘अर्जुन’ मोड़ के ।। ३ ।।