यदि आप चाहो घर में स्वर्ग झलकी
यदि आप चाहो घर में स्वर्ग झलकी,
आज व्रत धारो छोड़ो बात कलक। टेक।,
पुत्र पिता के व्रतों को पूर्ण करने वाला हो,
अनुकरणिय चरित्र आचरण जीवन में ढाला हो,
कुल की वैदिक परम्पराओं को समुचित पाला हो,
पुत्रों अनुव्रत भवतु गृहस्थ में उजियाला हो,
समझो दैविक देन है यह शुभ कर्म फल की।।1।।
प्रसन्नता से पुत्र करे प्रसन्न मात के मन को,
हृदय के उद्गार प्यार से सींचे नित्य जीवन को,
मां का स्नेह सम्पन्न करे मानसिक विकास वर्धन को,
मात्रा भवतु संमना सिखलाये मानव पन को,
नित्य पितृ यज्ञ से होवे समस्या हल की।।2।।
पति-पत्नि आपस में मीठे शान्ति प्रद ही बोलें,
विचार-विमर्श द्वारा गृहस्थ की उल्झी गुत्थी खोलें,
जीवन पथ पर मिलके चलें आपत्ति में ना डोलें,
तन से मन से और वचन से पूर्ण करें व्रत जो लें.
कर्त्तव्य पालन में ना ढील होने पाये पल की।।3।।
केवल यह आनन्द वैवाहिक जीवन में होता है,
गृहस्थ ही धरती पै स्वर्ग मिलता है जो टोहता है,
सद्व्यवहार आचार प्यार से स्वर्ग का समझौता है,
धर्म धुरेधर कर्मवीर प्रेमी न कभी रोता है,
जीवन में ना आये ललकी,
कपट छल की।।4!!










