विद्या धन अनश्वर है
विद्या धन अनश्वर है
जो नष्ट कभी न होता है।
जितना ज्यादा खर्च करो
उतना ही बढ़ जाता है।।
यथार्थ ज्ञान प्राप्त करे
वही विद्वान कहाता है।
विद्या का जो मनन करे
वह दुःखों से छूट जाता है।
विद्या को चोर चुरा नहीं
सकते छीन नहीं सकते राजा भी।
भाई बांट नहीं सकते हैं,
ऐसा धन है विद्या ही ।।
विद्या सदृश धन नहीं हैं,
झणभंगुर संसार में।
सर्व कर्म तजकर मानव,
लग जाओ विद्यादान में ॥
विधिवत् विद्योपार्जन कर्ता
सभी धनों को पाता है।
विद्वान समीप बैंक बैलेन्स नहीं
पर नृप चरणों में शीश झुकाता है।
इसीलिए तो कहता ‘शेखर’
विद्या पढ़ो विद्वान बनो।
तुरन्त दान महाकल्याण
उक्ति को चरितार्थ करो ॥
जीवन के चार स्तम्भ-स्वाध्याय,
साधना, संयम और सेवा।










