विद्वानों का मान नहीं, और मूर्ख का सत्कार जहां।

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विद्वानों का मान नहीं, और मूर्ख का सत्कार जहां।

विद्वानों का मान नहीं,
और मूर्ख का सत्कार जहां।
दुख ही दुख नित बढ़ते रहते,
उल्टे हों व्यवहार जहां।
काल पड़े बीमारी आवे,
रहती मारा मारि वहां।
“धर्मी”जिससे नर अरु नारी,
करते हाहाकार वहां है।

हैं त्रिया सुंदर सब घर में,
जो मन को हरने हारी है।
है बंधु सखा सब हित चिंतक,
और सेवक आज्ञाकारी है।
हैं गज घोड़े सब हृष्ट पुष्ठ,
जिन्हें देख चकित नर नारी हैं।
जब “धर्मी” मृत्यु आवेगी,
रह जांय यहां यह सारी हैं।

उन जन का जीवन क्या “धर्मी”,
रहती हों दुष्टा नारि जहां।
क्या मित्र मगन मन में होले,
मूरख मित्र का प्यार जहां।
क्या सिद्ध कार्य वहां का हो,
नौकर हों मूर्ख गवार जहां।
क्या सुख के निद्रा आती है,
सर्पों का हो घरबार जहां।

कन्या ही के सम होती है,
छोटी बहन दुलारी जो।
कन्या ही के सम होती है,
लघु भ्राता की प्यारी जो।
कन्या ही के सम होती है,
अपने सुत की नारी जो।
सब ही सत्य समझियो सारे,
कहे “धर्मी” प्रचारी जो।