तुझे मनवा जिसकी तलाश है।

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जिसकी तलाश है

(तर्ज-तुझे क्या सुनाऊँ ऐ दिलरुबा…)

  • तुझे मनवा जिसकी तलाश है।
    अति निकट उसका निवास है।
    काहे दर बदर तू भटक रहा
    वह तुम्हारे दिल के ही पास है।
    तुझे मनवा जिसकी तलाश है……..

१. यह जो मनुज तन धन प्राण है।
यह प्रभु मिलन का सामान है।
तेरी हर खुशी तेरे घर में है
फिर किस लिए तू उदास है।
तुझे मनवा जिसकी तलाश है……….

२. दो घूँट भी जल न पिया।
इनसान तूने यह क्या किया।
कब से नदी तट पर खड़ा
अब तक बुझी नहीं प्यास है।
तुझे मनवा जिसकी तलाश है……….

३. जब से तू राहों पे चल रहा।
तेरा हर यतन निष्फल रहा।
मथनी तो जल में चला रहा
और घी निकलने की आस है।
तुझे मनवा जिसकी तलाश है………

४. गुल टूट कर खिलता नहीं।
नर तन भी फिर मिलता नहीं।
तू वीरान कर न ‘पथिक’ इसे मिला
मख़मली जो लिबास है।
तुझे मनवा जिसकी तलाश है……….