संसार का किया है उपकार
संसार का किया है उपकार
महर्षि ने हंस-हंस के विष पिया
है कई बार महर्षि ने ।।
विधवा अनाथ बेकस निष्प्राण
हो चुके थे निज धर्म भूल
बैठे अंजान हो चुके थे।
सबका किया है आकर
उद्धार महर्षि ने ….।।
पग-पग पे ढोंगियों ने डाले
थे जाल अनगिन दर-दर भटक
रहे थे जाति के लाल अनगिन।
सबको गले लगाया किया
प्यार महर्षि ने …..।।
अंधकार को मिटाया वेदों
की रोशनी से पाखंड का
किया खंड पाखंड खंडनी से।
सत्यार्थ से किया है प्रहार
महर्षि ने ……।।
महिलाएं तो अभी भी ऋषि
को समझ न पायीं पूजें
मढ़ी-मसानी कब्रें संतोषी मायी।
जिनको “अभय” दिलाया
अधिकार महर्षि ने ….।।










