समलैंगिक विवाह अधिकार और हमारी परंपरा 0

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समलैंगिक अधिकार

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आज हरीभूमि दैनिक समाचार पत्र, हरियाणा संस्करण में समलैंगिकता को वैवाहिक मान्यता पर मेरा लेख प्रकाशित हुआ। लेख सलंग्न है।

समलैंगिक विवाह अधिकार

और हमारी परम्परा डॉ विवेक आर्य समलैंगिक विवाह को लेकर दायर की गईं याचिकाओं के जवाब में केंद्र सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपना उत्तर दाखिल किया है। सरकार ने समलैंगिक विवाह की अनुमति दिए जाने का विरोध किया है।

समलैंगिक अधिकार
समलैंगिक अधिकार

संविधान के अनुच्छेद 21 के प्रावधान के अनुसार समानता का सभी को मौलिक अधिकार है। इन याचिकाओं में हिंदू विवाह अधिनियम 1955, विशेष विवाह अधिनियम 1954 और विदेशी विवाह अधिनियम 1969 के तहत समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की मांग की गई है।

साथ ही समलैंगिक विवाह को मान्यता न देना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने 6 सितंबर 2018 को निर्णय सुनाते हुए समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया था। इसी निर्णय को आधार बनाकर समलैंगिकता के पक्षधर अब समलैंगिक विवाह को मान्यता दिलवाना चाहते है। सरकार ने कहा है कि समलैंगिक जोड़ों के साथी के समान रहने और यौन संबंध बनाने की तुलना भारतीय पारिवारिक परम्परा से नहीं की जा सकती।

केंद्र सरकार ने ये भी कहा कि द्वेष हस्तक्षेप व्यक्तिगत कानूनों के पुराने संतुलन को बर्बाद कर देगा। सरकार ने कहा कि समलैंगिक संबंधों की भूमिका की तरह रहने और यौन संबंध बनाने की तुलना भारतीय परिवार इकाई से नहीं की जा सकती है, जिसमें एक जैजिक पुरुष को पति, एक जैविक महिला की पत्नी और दोनों के बीच एक-दूसरे से मिलने वाली प्रकृति की पूर्व कल्पना है। हलफ़नामे में कहा गया है कि संसद ने देश में विवाह कानूनों को केवल एक पुरुष और एक महिला के मिलन को स्वीकार करने के लिए तैयार किया है।

https://youtu.be/O2WDpI3iPfU

ये क़ानून विभिन्न धार्मिक समुदायों के रीति-रिवाजों से संबंधित व्यक्तिगत क़ानूनों/ संहिताबद्ध क़ानूनों से शासित हैं। इसमें किसी भी हस्तक्षेप से देश में व्यक्तिगत क़ानूनों के नाजुक संतुलन के साथ पूर्ण तबाही मच जाएगी। सरकार ने आगे कहा कि भारत में विवाह से “पवित्रता” जुड़ी हुई है और एक “जैविक पुरुष” और एक “जैविक महिला” के बीच का संबंध “सदियों पुराने रीति-रिवाजों, प्रथाओं, सांस्कृतिक लोकाचार और सामाजिक मूल्यों” पर निर्भर करता है.

केंद्र सरकार ने इसे मौलिक अधिकार के तहत भी मान्य नहीं माना है। भारतीय विवाह व्यवस्था कोई आज की व्यवस्था नहीं है। यह प्राचीन ऋषियों ने सामाजिक उन्नति को ध्यान में रखते हुए सृष्टि के आदिकाल में स्थापित की थीं। इसका उद्देश्य दो विपरीत लिंग के मेल से उत्तम संतान की उत्पत्ति कर समाज के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाहन करना था। ऋषियों ने सामाजिक व्यवस्था के निर्माण के लिए ही पति-पत्नी, माता -पिता, पिता पुत्र, भाई बहन आदि सम्बन्ध बनाये।

इससे परिवार और समाज के संबंध में महत्व, सुख और शांति का वातावरण निर्मित हुआ और एक श्रेष्ठ मानव सभ्यता का निर्माण हुआ। आदि काल में स्थापित यह व्यवस्था आज भी सुचारु रूप से चल रही है। यही सार्थक, व्यवहारिक एवं सदा चलायमान जीने के उद्देश्य को सिद्ध करता है।

सामाजिक व्यवस्था को सिद्ध करने के लिए विवाह व्यवस्था को स्थापित किया गया। विवाह एक सामाजिक अनुष्ठान है जो परिवार को संगठित करता है। सुख शांति की समृद्धि करते हैं। अन्यथा व्यक्ति के समान जीवन यापन करने लगेंगे। विवाह के पवित्र उद्देश्य वाले पुरुष और स्त्री अपनी दम्पति बनकर वंश को आगे बढ़ाये और अपनी [पितृऋण की देयता को पूर्ण करें।

वर्तमान में इस व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने के कई प्रयास चल रहे है। समलैंगिक विवाह को मान्यता एक ऐसा ही प्रयास है। 2018 में समलैंगिक सम्बन्ध को मान्यता मिली। समलैंगिक विवाह के लिए प्रयास है। आगे व्यक्ति और पशु के सम्बन्ध के लिए कोर्ट जायेंगे। पिता-पुत्र, माता पुत्री, भाई बहन के सम्बन्ध के लिए कोर्ट जायेंगे।

सार्वजनिक रूप से सड़कों पर योन सम्बन्ध बनाने की अनुमति के लिए कोर्ट जायेंगे। नाबालिग के साथ शारीरिक सम्बन्ध को मान्यता देने के लिए जायेंगे। अश्लील फिल्मों को सार्वजनिक रूप से देखने को अपराध की श्रेणी से बाहर निकालने के लिए जायेंगे। बिना कपड़ों के सड़कों पर चलने की अनुमति के लिए कोर्ट जायेंगे। स्वेच्छा से आत्महत्या करने की अनुमति मिल जाएँ।

वेश्या-वृति को अपराध की श्रेणी से निकालने की अनुमति मिल जाएँ। आप जिस सीमा तक सोच सकते है। उससे कहीं आगे एक से एक बढ़कर कुतर्क अप्राकृतिक, घृणित, विकृत, अनैतिक व्यभिचार की सरकारी अनुमति के लिए जायेंगे। इन सभी का उद्देश्य केवल और केवल हमारी स्थापित उत्तम परम्पराओं और संस्कृति पर कुठाराघात कर समाज को छिन्न भिन्न करना हैं।

जो लोग खुद को गलत सोच के शिकार करते हैं। वही अपनी ग़लती को पूरे समाज पर थोपकर उसे बर्बाद करना चाहते हैं। इसके प्रसार से न सामाजिक मर्यादाएं सुरक्षित रहेंगी, न पारिवारिक संबंध की रेटिंग। नएं शुद्ध-चरित्र रहेंगे। कोई स्वच्छता उच्च आचरण नहीं रहेगा और पूरा वातावरण अशांत रहेगा। ही खतरनाक और नए अपराध जन्म लेंगे।

शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक धारणाओं में वृद्धि होगी। मानव समाज के पतन की यह निम्नतम सीमा होगी। इस पतन के समर्थक लेखक, पत्रकार, अभिनेता, स्वयंभू बुद्धिजीवी, मानवाधिकार कार्यकर्ता ऋषियों की महान संस्कृति और उनके विचारों से परिचित नहीं हैं। इसलिए वैदिक और विज्ञापनों के विरोधी हैं। प्रकृति की धारणा की आशंका कोई भी कार्य सदा हानि करता है। यह अटल नियम है।

समलैंगिक संबंध से संबंधित आय नहीं होगी। ऐसे में सेनेटाइजेशन के लिए क्या किया जाएगा? इसका उत्तर किसी के पास नहीं है। यह संबंध केवल शारीरिक तृष्णाओं की कभी न पूर्ण होने की प्रत्यक्षता के लिए होगा। ऐसे में पति पत्नी के बीच जो प्यार और आदर का रिश्ता होता है।

उसका विकास नहीं होगा। अब कोई कुतर्क करें कि शारीरिक संबंध प्रासंगिक होने के लिए पर्याप्त है। तब तो संसार में एक वेश्या सबसे सुखी प्राणी के रूप में जानी जाने लगी। पर ऐसा नहीं है। विदेश के उदाहरण हमारे भिन्न रूप में उपस्थित होते हैं। जहां ऐसे विश्राम से सामाजिक मर्यादा भंग हो गया है।

अवसाद , नशा, तलाक, अनचाहे बच्चे, आत्महत्या आदि इसके दुष्परिणाम दिखते है। मनुस्मृति में श्लोक 11/67 में समलैंगिकता के सम्बन्ध को मनुष्यों के लिए जाति से बहिष्कृत करने वाला अपराध बताया गया है। ऐसे अपराधी के लिए कठोर प्रायश्चित्त का विधान श्लोक 11/176 में बताया गया है। स्वामी दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश में ऐसे बुरे कर्म को करने वाले को दुष्ट-जन कहा गया है। उनकी तुलना पशुओं से की गई है। अंत में जो लोग निजता के अधिकार से समलैंगिकता को जोड़ रहे है। उनके लिए स्वामी जी द्वारा स्थापित नियम यथार्थ सिद्ध होता है कि ,’ सब मनुष्यों को सामाजिक, सर्वहितकारी, नियम पालने में परतंत्र रहना चाहिये और प्रत्येक हितकारी नियम पालने सब स्वतंत्र रहें।

‘ (लेखक ‘मनुस्मृति को जानें’ प्रसिद्ध पुस्तक के लेखक है)

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