ओ३म् विश्वानि देव
ओ३म् विश्वानि देव
सविदुरितानि परा सुव ।
यद्भद्रं तन्न आसुव ।।
भावार्थ हे! सर्वेश सकल सुखदाता ।
व्यापक ब्रह्म विशुद्ध विधाता ।।
सर्व नियन्ता विश्व प्रकाशक
पाप, ताप, अभिशाप विनाशक ।।
नष्ट सकल दुःख दुर्गुण कीजे।
जो है भद्र हमे वह दीजे ।।
ओ३म् अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्
विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो
भृयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम।
भावार्थ
प्रभो ! धर्म-अनुकूल प्रिय पुण्य पथ से,
हमें शीघ्र कल्याण की ओर ले चल ।।
परम देव ! तू जानता है हमारें,
सकल कृत्य जो हैं मलिन और निर्मल ।।
सभी पाप, दुष्कर्म कर नष्ट जिससे,
मनुज-जन्म हो पूर्ण सार्थक समुज्जवल ।।
अमित्त स्नेह, श्रद्धा-सहित कर रहे हैं,
कि तेरे लिए हम नमस्कार प्रतिपल ।।
























