ओ३म् अखिलेश
ओ३म् अखिलेश अजन्मा अमर अकाया है।
मूर्ति जिसकी नहीं यह वेद ने बतलाया है।।
सारे ब्रह्माण्ड में आकाशवत् समाया है।
सर्व कल्याणमयी उसकी छत्रछाया है।।
ओ३म् अखिलेश अजन्मा अमर अकाया है।
मूर्ति जिसकी नहीं यह वेद ने बतलाया है।।
सारे ब्रह्माण्ड में आकाशवत् समाया है।
सर्व कल्याणमयी उसकी छत्रछाया है।।
कदम अपना आगे बढ़ाता चला जा।
क्यों सोए हुए फले कितने मतों के आर्यवीरो
हो समय ने फिर ललकारा है।
जवानो जवानी में चलना सम्भल के आती नहीं
आर्यवीर दल रहा रहेगा प्राण आर्यों का।
वैदिक रीति सिखलाई-सिखलाई आर्यसमाज ने।
हमको तो दुनिया जाने हम वीर दयानन्द के।
ऐसे नौजवानों की फिलहाल जरूरत है।
मेरे देवता के बराबर जहाँ में
जल्दी से जल्दी से उठो जरा
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