कहा भी न जाये चुप रहा भी न जाये ।(धुन-मार दिया जाये या छोड़)
कहा भी न जाये चुप
रहा भी न जाये।
बोलो गमे राज हम छिपायें
या सुनायें। टेक।
कोई अपना नजर नहीं आता
कहें अपनी जिसे बेबसी को।
गैर सुन सुनकर खिल्ली उड़ाये
सहन कैसे करे उस हँसी को ।।
मौत आती नहीं जिन्दगी
भाती नहीं।
कैसे घुट घुट के जीवन बितायें । । 1 ।।
इस धर्म निरपेक्षता की आड़ में
हम पर घातक चलायें वह निशाने।
चोट खाकर हम चीखें चिल्लाये
कोई आता नहीं है बचाने।
ज्योति ना आंखों में
शक्ति ना पाँखों में।
बिन पंखों के पक्षी कहायें ।।2।।
गुण गौरव मिटाना हमारा
आज चाहता है सारा जमाना।
खानपान भेष भाषा को
भुलाकर मिटा रहें इतिहास पुराना ।।
खोह बसैया कहें
पेड़ चढ्या कहें।
यहां के वासी नहीं
कहीं से आये।।3।
जिनकी रक्षा की थी जिम्मेदारी,
उनको झगड़ो से फुरसत नहीं है।
नाव भँवर मे मांझी नशे में
प्रेमी बचने की सूरत नहीं हैं।।
झूठे पहरेदारों ने दुष्ट मक्कारो ने।
देकर विश्वास हम लुटवाये। ।4।।










