मनीषी चिन्तन
सत्य सनातन प्राणवंत है। नित्य निरंतर नव वसंत है।
जो भी मेरे पुरखों को गाली देगा,
धर उसकी छाती पर दोनाली दूंगा।
जीभ काट कर रख दूं तुरत हथेली पर,
गाली के बदले न कभी गाली दूंगा।।टेक।।
सत्य सनातन का जाया हूं सुन लेना,
डर जाऊंगा यह सपना मत बुन लेना।
चक्र सुदर्शन वंशी साथ साथ रखता,
जो भी अच्छा लगे उसी को चुन लेना।
अगर प्रलय भी आ जाए परवाह नहीं,
नहीं शत्रु को पूजा की थाली दूंगा ।
जो भी-_—-++————
कान खोलकर सुन लें सारे जेहादी,
न्योत रहे हैं सब अपनी ही बर्बादी।
जिसके बलबूते पर नंगे नाच रहे ,
नहीं बचा पायेगी वो नकली खादी ।
बेनूरों को सुन्दर हूरों के बदले,
कंठ कटैया मां दुर्गा काली दूंगा।
जो भी —–++————-
परशुराम का परशु धारकर आया हूं।
अहम वहम का दैत्य मारकर आया हूं।
शत्रु रक्त से मुख निखारकर आया हूं।
अपने धड़ से सिर उतारकर आया हूं।
भारत मां को गाली देने वालों को,
रहने को केवल गन्दी नाली दूंगा।
जो भी ——++————-
इस धरती को भोग भूमि ही मान रहे।
कदम कदम पर कर इसका अपमान रहे।
परकीयों की हरियल चादर तान रहे।
सोच रहे पैरों में हिन्दुस्थान रहे।
उनके शेखचिल्लिया मंसूबों को मैं,
करके तालाबंद नहीं ताली दूंगा ।
जो भी—–++-_—————
राम कृष्ण गुरु नानक की सौगंध मुझे।
महावीर,गौतम से है अनुबंध मुझे।
दयानंद ऋषिवर से मिली सुगन्ध मुझे।
भूषण,चन्द,मिला दिनकर से छन्द मुझे।
अपना कब्रिस्तान ढूंढ लें और कहीं,
सज्जन को सूर्योदय की लाली दूंगा।
जो भी ——++_—————
मैं सागर की छाती पर चलने वाला।
नभचुम्बी हिमशिखरों पर चढ़ने वाला।
वेद मार्ग पर बिना थके बढ़ने वाला।
मानवता हित नये मूल्य गढ़ने वाला।
मेरे व्रत त्यौहार सभी श्रद्धेय मुझे,
नहींमनीषीहोली दीवाली दूंगा।
जो भी मेरे पुरखों को गाली देगा,
धर उसकी छाती पर दोनाली दूंगा।
जीभ काट कर रख दूं तुरत हथेली पर,
गाली के बदले न कभी गाली दूंगा।










