अ॒स्य श्रवो॑ न॒द्य॑: स॒प्त बि॑भ्रति॒
द्यावा॒क्षामा॑ पृथि॒वी द॑र्श॒तं वपु॑: ।
अ॒स्मे सू॑र्याचन्द्र॒मसा॑भि॒चक्षे॑ श्र॒द्धे
कमि॑न्द्र चरतो वितर्तु॒रम् ॥
ऋग्वेद 1/102/2
जहाँ भी देखो वहीं है ईश्वर,
यशोगान गाती हैं नदियाँ,
सागर परिचय प्रभु का देते,
प्रभु महिमा चहूँ ओर,
सृष्टि की प्रभु के हाथ में डोर
द्यावा पृथ्वी अन्तरिक्ष सब,
जगदीश्वर की काया
व्याप्त है इन सबमें परमेश्वर,
अद्भुत जिसकी माया
वात्सल्यों का अमृत देते,
देते सुख चहूँ ओर
भूमि पादतल परमेश्वर का,
उदर अन्तरिक्ष सोहे
शीर्षस्वरूप है द्यौ: ईश्वर का,
परमब्रह्म मन मोहे
सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर को करें
नमस्कार कर जोड़
सूर्यचन्द्र हैं प्रभु की आँखें,
अग्नि प्रभु मुख होती
वायु जिसके प्राण अपान हैं,
किरणें दृष्टि सम होतीं
बने प्रज्ञानी सर्व दिशायें,
ज्ञान की बनती स्त्रोत
सूर्यचन्द्र विपरीत दिशा से,
उदित होके सुख बाँटें
बुद्धिमान ही केवल जाने,
प्रभु सृष्टि के नाते
जो प्रभु की साता ना जाने,
वो अज्ञानी घोर
माटी का ढेला गल जाये,
जब-जब जल में डालें
चहूँ ओर पृथ्वी के जल है,
पृथ्वी घुल ना पाये
कैसी लीला परमेश्वर की,
पले पृथ्वी प्रभु गोद
जो पदार्थ अग्नि में जाये
अग्नि उसको जलाये
लेकिन देह में व्यापक अग्नि,
जीवमात्र को जिलाये
कहीं प्रकाशे कहीं जलाये,
कैसी अद्भुत शोध
एक से एक पदार्थ प्रभु का
कैसा विलक्षण अद्भुत
वैज्ञानिक ना प्रभु सा कोई,
अनुसन्धानी अचम्भित
मानव कल्पना कुण्ठित होवे,
पाये ना प्रभु का छोर
रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
पाद तल = चरण
प्राण अपान = स्वाच्छाश्वास
विलक्षण = विवेकपूर्ण
अचम्भित = आश्चर्यचकित
अनुसन्धानी 3= जाँच पड़ताल करने वाला










