हो भज मन प्यारे…

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हो भज मन प्यारे (तर्ज- हो बाबुल प्यारे..)

हो भज मन प्यारे…
ओ३म् ही नाम अति उत्तम,
दुःखों में वही बने हमदम
जाप कर उसका ही हरदम… हो.. ।।१।।

बाप ने भारी त्रास दिये थे
अपने ही लाडले को गिरि
से गिराया जल में डुबाया
अपने ही लाडले को बैठा
ओ३म् नांव में, बेड़ी खनके पाव में।
आह मुख से ना बरसे नयन हो…।।२।।

लंका पति ने कष्ट दिये थे
कितने ही जानकी को छल
से बल से भय दिखलाये कि
तने ही जानकी को नाता प्रभु बाहों से,
लंका डूबी आहों से। हुआ
रावण का ऐसे मरण हो…।।३।।

गुरूदत्त जैसे मिले अनेकों कितने
ही स्वामी जी को अन्त को हारे
ओ३म् को देखा जपते ही स्वामी
जी को भक्त रोये वो हंसे,
फूले खिला हो जैसे पिता
इच्छा हो तेरी पूरण हो…।।४।।