ईश महिमा
हे प्रभु । परमपिता ! तुम गुणों की खान हो।
तुम अनादि तुम अनन्त, पूर्ण तुम्हीं महान हो।।
सूर्य चन्द्र से विशाल, लोक तुम में हैं बसे।
प्राणियों के प्राण तुम, सर्वशक्तिमान हो।।
तुम अनादि तुम अनन्त…………….
नित्य भोजन आदि से, प्राणियों को पालते।
तुम विधाता दाता तुम, तुम दया निधान हो।।
तुम अनादि तुम अनन्त……….
कौन ऐसा कार्य है, जो छिपाया जा सके।
सब जगह सदैव जब, आप विद्यमान हो।।
तुम अनादि तुम अनन्त…………
ढूँढ़ने तुम्हें “प्रकाश” क्यूँ गया प्रयाग में।
वो ही हृदय में पाएगा, जिसको सच्चा ज्ञान हो।।
तुम अनादि तुम अनन्त…………










