हे मनुष्य गौओं को कभी मत मारा कर
हे मनुष्य गौओं को
कभी मत मारा कर
तुझको चेताते रहते
सदा परमेश्वर
गौ बेचारी भोली है
बिल्कुल निर्दोष है
जब तक वह सामने है
उसका उपयोग है
मारता है क्यों उसे
वसुधन ना गँवाया कर
हे मनुष्य गौओं को
कभी मत मारा कर
तुझको चेताते रहते
सदा परमेश्वर
मारता रहेगा पापी
उससे क्या लड़ेगी
भोली-भाली बेचारी
व्यर्थ मरेगी
मिला है जो पूजित धन
उसको सम्भाला कर
हे मनुष्य गौओं को
कभी मत मारा कर
तुझको चेताते रहते
सदा परमेश्वर
महत्वशालिनी है
गौएँ देव-सम्बन्धिनी
केन्द्र अपनेपन का है
मानवों की सङ्गिनी
दया, प्रेम, सत्कार
हृदयी प्रीत द्वारा कर
हे मनुष्य गौओं को
कभी मत मारा कर
तुझको चेताते रहते
सदा परमेश्वर
गौ आत्मशक्ति है
ना उस पे वार करना
माता का घात करना
आत्मघात है अपना
पश्चाताप कर लेना
ये पाप ना दोबारा कर
हे मनुष्य गौओं को
कभी मत मारा कर
तुझको चेताते रहते
सदा परमेश्वर
रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
*रचना दिनाँक :– * २०.२.२००२ १.३० मध्यान्ह
राग :- पहाड़ी
गायन समय रात्रि का प्रथम प्रहर, ताल कहरवा ८ मात्रा
शीर्षक :- अमरता केन्द्र
वैदिक भजन ८८१A वां
आज भाग 1 कल भाग 2 परसों भाग३
*तर्ज :- *
0228-828
शब्दार्थ :-
वसुधन = बसाने वाला धन
अप्रतिरोधिनी = विरोध न करने वाली
वसुधन = बसाने वाला धन
अप्रतिरोधिनी = विरोध न करने वाली
प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :– 👇👇
अमरता केन्द्र
हे मनुष्य! तू गौ को कभी मत मार। इस निरपराध बेचारी गौ को कभी मत मार। तू चेताने वाला है, तुझे परमात्मा ने कुछ समझ, अक़्ल, बुद्धि दी है। इसलिए तुझे कहता हूं–तू गौ- घात कभी मत करना!
तू ज़रा-सा अपनी समझ का उपयोग करेगा तो तुझे पता लग जाएगा कि यह गौ यद्यपि बड़ी भोली,बेचारी, बिल्कुल निर्दोष है, इसलिए इसे कोई भी कभी मार सकता है, मारने से यह मर जाएगी, कोई प्रतिरोध न करेगी, पर साथ ही यह इतनी महत्व शालिनी है, सब देवों की संबंधिनी और अमर पन का एक केंद्र है की इसका मारना अपना नाश करना है, इसका घाट करना आत्मघात है। यह गौ कहीं और नहीं, हमारे अंदर है। ‘अदिति’ आत्मशक्ति, है, वाणी है, अंतरात्मा की वाणी है, अंदर की आवाज है। इसे तुम जब आओगे तो बेशक यह चुपचाप दब जाएगी, पर इससे तुम्हारा आत्मा नष्ट हो जाएगा। ‘अदिति’ वाणी (यह आदित्य की बहिन) वसुओं–आत्मा की वासक अग्नीओं से प्रकट होती है (इनकी पुत्री है) और मनुष्य के सब रूद्रों-प्राणों–की और सब चेष्टाओं की माता है। यह ऐसी अमृत वस्तु है कि इसे मारने का यत्न करने वाला खुद मर जाता है, और इसकी रक्षा करने वाला ही सुरक्षित रहता है। इसी अंदर की ‘गौ’की प्रतिनिधि आधिदैविक में भूमि है, आदि भौतिक में राष्ट्र देवी है। और पशुओं में गौ माता है। हे चेतना वाले मनुष्य! तू समझ कि इन गांवों का भी घात कितना भयंकर परिणाम लाने वाला है। भूमि राष्ट्र और गायों की रक्षा करने में ही मनुष्यों की, मनुष्य -जाति की रक्षा है। देखना, इस भूमि गौ की, इस राष्ट्र-गौ की तथा इस गौ पशु की जरा भी हिंसा करने वाला कर्म तुझसे ना हो। जब कभी इन सर्वथा और अप्रतिरोधिनी गौओं की हिंसा करने का प्रलोभन आए तो याद कर लेना कि यह सब अमृत की नाभियां हैं और अपने- अपने क्षेत्र के आदित्यों, वसुओं और
रुद्रों से संबंधित दिव्य शक्तियां हैं। इनको मार कर तो कभी फूल- फल नहीं सकता, पर अन्त में सब बाह्य गौओं की तो अन्तरात्मा की वाणी है। इस गौ को तो कभी मत छेड़ना, इसे सदा पालना पहुंचना और इसकी आज्ञा को सदा मानना। अपना सर्वस्व स्वाहा करके भी इस गौ की रक्षा करना। इसे जरा भी नहीं दबाना। यदि इस अमृत- नाभि ‘अदिति’गौ का रक्षण, पोषण और वृद्धि होती गई तो तू भी एक दिन अमृत हो जाएगा, देवों का राज्य पा जाएगा। देखना, इस सर्वथा अप्रतिरोधिनी परम शान्त गौ का तेरे यहां ज़रा भी तिरस्कार ना हो पाए, इसे ज़रा भी क्षति ना पहुंचने पाये।










