दृष्टि दे दो हे आत्मन् !!

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दृष्टि दे दो हे आत्मन् !!

दृष्टि दे दो हे आत्मन् !!
दर्शन शक्ति आ जाए
तम का उठा दो पर्दा
सूक्ष्म दृष्टि पा जाये
बन्धन हमारे तुम काटो
सुप्रकाश अपना हमें बाँटो
तव इन्द्र शरण पा जाएँ
दृष्टि दे दो हे आत्मन् !!
दर्शन शक्ति आ जाए

पाँच इन्द्रियाँ ज्ञान की
सब के शरीर में रहती हैं
पंछियों के जैसे इत उत
बस उड़ती फिरती रहती हैं
पाँच विषय के रसों में उलझी
तृष्णा हमारी पल पल और बढ़ाए
दृष्टि दे दो हे आत्मन् !!
दर्शन शक्ति आ जाए

कान जीभ आँखें जब खोलें
जगत् विविध दिख जाए
ऐसा जादू करे हम पे
इन्द्रियाँ हमें भरमायें
तृप्त कर सके ना कभी हमको
मार्ग में देखो खड़ी हैं लाख तृष्णायें
दृष्टि दे दो हे आत्मन् !!
दर्शन शक्ति आ जाए

पाँच इन्द्रियाँ बाह्य प्रकाश से
तृप्त ना कभी कर पाए
इन्द्रिय छठी इस मन के द्वारा
प्रत्याहार जगायें
उड़ना इन्द्रियों का थम जाए
परिमितता अन्धकार की मिटती जाए
दृष्टि दे दो हे आत्मन् !!
दर्शन शक्ति आ जाए

देश कालाव्यवहित दर्शन की
शक्ति हममें जगा दे
हे आत्मदेव हे इन्द्र !
प्रकाश का मार्ग सुझा दो
तुझ बिन और कहाँ जाएँ हम
छाए हुए यहाँ विषय-विषयों के साये
दृष्टि दे दो हे आत्मन् !!
दर्शन शक्ति आ जाए
तम का उठा दो पर्दा
सूक्ष्म दृष्टि पा जाये
दृष्टि दे दो हे आत्मन् !!