आर्यों के तुम हो प्राण ऋषि
आर्यों के तुम हो प्राण ऋषि
दयानन्द तुम्हारा क्या कहना।
तेरी भक्ति का क्या कहना,
प्रभु की शक्ति का क्या कहना।
वेदों का किया प्रचार ऋषि
दयानन्द तुम्हारा क्या कहना।
मरकर भी अमर है नाम तेरा,
मूलशंकर का ‘हरिओम्’ क्या कहना।
सच्चे ईश्वर की की तलाश,
ऋषि दयानन्द तुम्हारा क्या कहना ॥
कन्या गुरुकुल भी खुलवाये,
विधवा-विवाह भी करवाये।
नारी का किया सम्मान,
ऋषि दयानन्द तुम्हारा क्या कहना ॥
पाखण्ड मिटाया है जग से,
अन्धकार का पर्दा फास किया।
डूबतों को उबारा है तुमने,
ऋषि दयानन्द तुम्हारा क्या कहना ॥
ईंटें पत्थर भी खाये हैं तुमने,
पर भेद नहीं लाये मन में।
करुणा के थे भण्डार,
ऋषि दयानन्द तुम्हारा क्या कहना ॥
पाचक ने विष का दूध दिया,
ऋषिराज ने उसको माफ किया।
कई बार किया विषपान,
ऋषि दयानन्द तुम्हारा क्या कहना ॥










