आँख मिचोनी झूठ का अब बन्द होना खेल चाहिये।
आँख मिचोनी झूठ का
अब बन्द होना खेल चाहिये।
आज मेरे भारत को फिरसे
कोई पटेल चाहिये ॥ टेक ।।
झूठे कल्पवृक्ष की छाया
में दिन कितने बीत गये।
आज और कल में गर्मी
वर्षा जाने कितने शीत गये ॥
लोकतन्त्र की ओट में
सामन्तवादी बाजी जीत गये।
बम विस्फोट और हत्याओं
से दिल हो अब भयभीत गये॥
कमजोर थके हाथों का हमें
नहीं शासन फेल चाहिये॥
दाऊद मैमन बन्धु हाजी
मस्तान जहां पर पलते हों।
नेता और अभिनेताओं के
कार्य जिनसे चलते हों।
स्मिगलर चोरों के दखल भी
नहीं शासन से टलते हों।
अरबों क्या खरबों के धन
बैंकों से रोज निकलते हों।
बचकर साफ निकल जाते
जिन्हें होनी जेल चाहिये ॥
क्या हम बहू गरीब की हैं
जो हमारा कोई व्यक्तित्व
नहीं जो चाहे हमें छेद बैठे
गोया कोई अस्तित्व नहीं
प्रताप शिवा की सन्तानों
में लगता है पुरुषत्व नहीं।
पुरुषत्व बिना तो किसी
का कायम रहता है स्वामित्व
नहीं उदण्डता के ऊँट की
नाक में गिरनी नकेल चाहिये॥3॥
साम दाम दण्ड भेद की नीति
जब तक ना कायम हो।
पञ्च माँगियों की मांगे
बढ़ती जायें ना कम हो॥
हिन्दू का सैनिक करण यहां
होते ही विघ्न खत्म हो।
अनुच्छेद तीन सौ सत्तर
हटते ही काश्मीर में हम हों॥
अपनों से अपनों का कर्मठ
होना मेल चाहिये ॥4॥










