“अजर” अमर निर्भय जगदीश्वर तू सर्वज्ञ महान् ।
“अजर” अमर निर्भय
जगदीश्वर तू सर्वज्ञ महान् ।
अणु अणु इस अखिल
जगत् का करता तब गुणगान ॥
आये हम सब शरण
तुम्हारी कर दीजे कल्याण।
तब चिन्तन में चित्त रमे
प्रभु दीजे यह वरदान ॥
दूर हटें घनघोर घटायें
हो भारत उत्थान ।
दीन दुःखी न दीखे
कोई हों सुख के समान।
‘पाल’ पैदा हों दिव्य तपस्वी
कपिल कणाद समान।
धर्म-धनी मुनि और गुणी
विद्वान् तथा बलवान् ॥










