अच्छे लगे है अब तलक तो चेतना के स्वर तुम्हें।
अच्छे लगे है अब तलक
तो चेतना के स्वर तुम्हें।
अब सुनाना चाहता हूं
वेदना के स्वर तुम्हें॥टेक॥
वेदना से राष्ट्र की हर
राष्ट्रवादी है दुःखी।
अपमान होता जा रहा
स्वाभिमान की गर्दन झुकी॥
क्या जिन्दगी लगती गुलामी
से भी ना बदतर तुम्हें ॥1॥
स्वतन्त्रता के आने पर
भी राष्ट्र भाषा है कहां।
मांथे की बिन्दी, हिन्दी का
तो दूसरा दर्जा यहां ॥
हीनता अनुभव नहीं
अंग्रेजी को रटकर तुम्हें ॥2॥
और कोई कुछ भी कहे
हम चुप रहें यह बात क्या।
हिन्दोस्तां में हिन्दुओं का
रहना है अपराध क्या॥
सैकुलरिजम के पिंजरे में
क्या मरना है सड़कर तुम्हें ॥3॥
किस तरह मजहब की
सुरक्षा अपना मुंह फैला रही।
तुष्टिकरण की नीति ही
इस राष्ट्र को अब खा रही॥
कर रहा हर दिन हलाक,
अपना ही खंजर तुम्हें ॥4॥
आत्मशक्ति राष्ट्र की अब
किस तरह से जागेगी।
जब सभ्यता पूरब की
पश्चिम की तरफ से भागेगी॥
नष्ट होने का ना अपने
लग रहा है डर तुम्हें ॥5॥
आत्मशक्ति संगठन से
राम ने रावण को मारा।
कंस और जरासंध को
घनश्याम ने भू पर पछारा॥
याद कब आयें धनुर्धर,
कृष्ण चक्रधर तुम्हें ॥6॥
किस लिए बतलाओ तो
प्रताप जंगलों में फिरा।
घास की रोटी चखी,
पिया नीर झरनों से झरा॥
सर झुके ना ख्वाब में
प्रताप का अकबर तुम्हें ॥7॥
शक्ति शिवा की देखकर
औरंग था थर्रा गया।
चमकी भवानी दामनी सी
भगवा ध्वज फहरा गया॥
धन्य शिवा धन्य शिवा यह
कहते झुकता सर तुम्हें॥8॥
संगठन का मन्त्र तो
स्वामी दयानन्द दे गया।
आगे और कुछ कहदूं तो
अध्याय छिड़ जाये नया॥
एकता का हर घड़ी
देता रहा अवसर तुम्हें ॥9॥
देव के तुल्य ऋषि की
कदर जो करते यहां।
अखण्ड हिन्दोस्तान होता
कदमों में झुकता जहां ॥
कर्मठ अकल आ जाती
मनु और वेद को पढ़कर तुम्हें ॥10॥










