आदिकाल से रीत यही है
आदिकाल से रीत यही है,
करो नमस्ते जी….
वेदों में ही इसको पाया,
ऋषि-मुनियों ने यही बताया।
देश-विदेश कहीं पर जाओ,
करो नमस्ते जी……
रामायण भी यही सिखाती,
गीता भी इसके गुण गाती।
महाभारत भी यही बताती,
करो नमस्ते जी…
राम-कृष्ण वेदों के पुजारी,
जिनको जाने दुनिया सारी।
उनकी आज्ञा को अपनाओ
करो नमस्ते जी……
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई,
मिले मित्र या भाई-भाई।
आदर प्रेम की श्रेष्ठ विधि है,
करो नमस्ते जी…..
सब नर-नारी करो नमस्ते,
बच्चे-बूढ़े हँसते-हँसते,
विश्व प्रेमी के पाठ को पढ़ते,
करो नमस्ते जी…..
जो चाहते हैं भव से तरना,
राग-द्वेष छल-कपट न करना,
उल्टा रास्ता छोड़ के चलना,
सीधे रास्ते जी, करो नमस्ते जी…..
‘प्रेमी’ कष्ट मुसीबत सहना,
संघर्षों से कभी न डरना,
सुख हो या दुख,
हर हालत में हँसते रहना जी,
करो नमस्ते जी……
























