दयानन्द ने गर जगाई न होती।

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दयानन्द ने गर जगाई न होती।

दयानन्द ने गर जगाई न होती।
तो वेदार हरगिज खुदाई न होती।।1।।

न कातिल परस्ती जमाने से मिटती।
जो वेदों की बंशी बजाई न होती।।2।।

निशाँ राम का, कृष्ण का मिट चुका था।
ऋषि ने जो हलचल मचाई न होती।।3।।

न इस्लाम के ढोल की पोल खुलती।
जो स्वामी ने हिम्मत दिखाई न होती।।4।।

न बिल बन्द होता किसी बाइबिल का।
खुदावन्द की जग, हँसाई न होती।।5।।

जहन्नुम व जन्नत के खुलते न किस्से।
यों अशेंबरी की, सफाई न होती।।6।।

पता हिन्दुओं का जहाँ में न मिलता।
जो शुद्धि की बूटी, पिलाई न होती।।7।।

न सुनने को मिलते, वतन के तराने।
अगर देश भक्ति, सिखाई न होती।।8।।

जहालत की काली, घटायें न टलीं।
जो स्वामी की जलवा, नुमाई न होती।।9।।

‘मुसाफिर’ अगर, जिन्दगी तू न पाता।
धरम पै जो गर्दन, कटाई न होती।।10।।