🌿🌿🌿🌿ओ३म्🌿🌿🌿🌿
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(1) चार नरक की खान हैं, अतिमान, अहंकार ।
दुःख देना जनदीन को, हरना पर धनसार ।।
(2) चार चतुर जन हैं सही, जो करते उपकार ।
सेवा दीन अनाथ की, जन हित और सुधार ।।
(3) तीन कर्म अति नीच तज, क्रूरता अत्याचार ।
मारना निरपराध को, पतित कर्म व्यभिचार ।।
(4) तीन शत्रु से बचे रहो, जो करते हैं हान ।
दोष लगाना, छल कर्म, कभी न देना दान ।।
(5) सीख संत हैं तीन गुण, ईश-भक्ति शुभ नाम ।
सेवा सज्जन संत की, दीन की शोभा धाम ।।
(6) पांच चोर से चतुर बच, क्रोध, कपट, अतिद्वेष ।
लोभ पराई वस्तु का, निन्दा जान विशेष ।।
(7) प्रभु भक्तों में पांच गुण, विनय, दान को धार ।
सेवा हित करते सदा, मान बड़ाई मार ।।
(8) पांच सखा संग ले, संगति, सुमति, प्यार ।
दान दया को समझ ले, बन कर एक उदार ।।
(9) छः से स्व को बचाईये, ईर्ष्या पैशुन द्रोह ।
झूठ परस्पर कलह से, करना अति ही मोह ।










