शिखरिणी छन्दः
यदा किञ्चिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवम्,
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मनः।
यदा कि९िचत् कि९िचद् बुधजनसकाशादवगतं,
तदा मूर्खोऽस्मीति ज्वर इन मदो मे व्यपगतः।।
(भर्तुहरिकृत- नीतिशतक, श्लो. ७)
भावार्थ- जब मैं बहुत थोड़ा जानता था तब मदोन्मत्त हाथी की भांति घमण्ड से अन्धा हो गया था और अपने मन में यह समझता था कि ‘‘मैं सब कुछ जानता हूं’’, परन्तु जब बुद्धिमानों की संगति से कुछ-कुछ ज्ञान हुआ, तब पता चला कि ‘‘मैं तो मूर्ख हूं’’, उस समय मेरा अभिमान ज्वर की भांति उतर गया।
























