येषां न विद्या न तपो न दानं

0
3
येषां न विद्या न तपो न दानं

येषां न विद्या न तपो न दानं

येषां न विद्या न तपो न दानं,
ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता,
मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति।।
(भर्तृहरिकृत- नीतिशतक, श्लो.१२)

भावार्थ- जिन मनुष्यों में न कोई विद्या है, न विद्या प्राप्त करने के लिए तपस्या करते हैं, न दान की प्रवृत्ति है, न ज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा है, न सरल स्वभाव है, न जीवन में और कोई उत्तम-उत्तम गुण हैं, न धर्मयुक्त व्यवहार करते हैं। ऐसे मनुष्य तो धरती पर भार बनकर पशु-समान खाते-पीते हुए जीवन को नष्ट कर रहे हैं।