उदयति यदि भानुः पश्चिमे दिग्विभागे

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उदयति यदि भानुः पश्चिमे दिग्विभागे

मालिनी छन्दः

उदयति यदि भानुः पश्चिमे दिग्विभागे,
प्रचलति यदि मेरुः शीततां याति वह्निः।
विकसित यदि पद्मं पर्वताग्रे शिलायाम्,
न भवति पुनरुक्तं भाषितं सज्जनानाम्।।

भावार्थ : सूर्य चाहे पूर्व की अपेक्षा पश्चिम दिशा में उदय क्यों न हो, पर्वत चाहे चलने क्यों न लग जावे, अग्नि चाहे ठण्डी क्यों न हो जाए, कमल चाहे पर्वत की कठोर शिला पर क्यों न हो जाएं, किन्तु जो सज्जन लोग हैं वे अपनी प्रतिज्ञा को, अपने दिए हुए वचन को नहीं बदलते, उस पर दृढ़ रहते हैं।