धन्य तेरी करतार कला का

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धन्य तेरी करतार कला का

धन्य तेरी करतार कला का,
पार नहीं कोई पाता है
धन्य तेरी करतार कला का,
पार नहीं कोई पाता है

_ निराकार तू होकर स्वामी,_ (1)
सबका पालन करता है,
निराकार निर्बन्धन दाता ,(2)
जनम मरण नहीं धरता है (3)
धन्य तेरी करतार कला का,
पार नहीं कोई पाता है

ऋषि मुनि और सन्त महात्मा,
निश दिन ध्यान लगाता है, (4)
चार खान चौरासी के माहि, (5)
तू हीं नजर एक आता है।
धन्य तेरी करतार कला का,
पार नहीं कोई पाता है

पत्ते पत्ते पर रोशनी तेरी,
बिजली सी चमक दिखाता है ,
चकित भया मन बुद्धि मेरी,
“जीवादास” गुण गाता है
धन्य तेरी करतार कला का,
पार नहीं कोई पाता है

रचनाकार :- सन्त श्री स्वामी जीवनराम जी महाराज (जीवाराम, जीवानन्‍द अथवा जीवादास जी)