जिसके मन में बसी बुराई

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जिसके मन में बसी बुराई

जिसके मन में बसी बुराई
उसे सुहाती नहीं भलाई
??? रग पर हे जीवों ने पर ज्यों ???
गड़बड़ अगर पेट में आई
स्वाद न कुछ फिर भोजन में हो
खट्टा मीठा या नमकीन
गीत सुनाऊँ आज नवीन

दर-दर पर मत झुका माथ रे
भगवन् तेरे सदा साथ रे
दिखा न हाथ ज्योतिषी को तू
रण में दो-दो दिखा हाथ रे
भ्रष्टाचारी देश-शत्रु से
छपट मोर्चा – ले संगीन
गीत सुनाऊँ आज नवीन

जीत साहसी की ही होती
कायर-नर की किस्मत सोती
क्यों न ढूँढ लाये तू गहरे
गोता लगा – कीमती मोती
सिन्धु किनारे बैठे-बैठे
तू कोरे कंकर मत बीन
गीत सुनाऊँ आज नवीन

खो न एक क्षणमात्र कहीं तू
निडर चला चल राह सही तू
जो व्यवहार कहे अपने हित
सबसे कर व्यवहार वही तू
खुद जी, औरों को जीने दे
मत अधिकार किसी का छीन
गीत सुनाऊँ आज नवीन

रहे “प्रकाश” इन्द्रियाँ संयत
जो नर तन हो सब में उन्नत
सच है कथन बुरा देखो मत
सुनो बुरा मत, कहो बुरा मत
हृदय ग्रन्थी में अभी बाँध ले
यतन समान वचन ये तीन (1)
गीत सुनाऊँ आज नवीन

रचनाकार :- पूज्य पण्डित प्रकाशचन्द्र जी आर्य कविरत्न