“मोहन” जागी उमङ्ग मन की

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“मोहन” जागी उमङ्ग मन की

“मोहन” जागी उमङ्ग मन की
मीठी सी गुञ्जार है किसकी?
मेरा हृदय-मन छलक रहा है
तरुण तरङ्ग है करुणानिधि की
“मोहन” जागी उमङ्ग मन की

क्या तुम मेरे हृदय-कलश में
जलतरङ्ग मृदु बजा रहे हो
बह रही कल-कल प्रेम की गङ्गा
करुणा सिन्धु है तरङ्ग तुम्हारी
“मोहन” जागी उमङ्ग मन की

है आविष्ट हृदय यह मेरा
इसमें बिजली दौड़ रही है
क्या यह मधुर मृदु हाथ हैं तुम्हारे
मधु सञ्चार कर रही है बिजुरी
“मोहन” जागी उमङ्ग मन की

जनित हो रहा विद्युत से रस
जिसमें रोम-रोम मम डूबा
है मिठास अद्भुत इस रस की
कैसी सात्विक मस्ती इसकी
“मोहन” जागी उमङ्ग मन की

मुझ तक यह रस नहीं है परिमित
परिमित ऽऽऽ
परिमित ऽऽऽ
मुझ तक यह रस नहीं है परिमित
ये सकल जगत में संस्थित
जगत् विभूतियां फैली चहुं दिशी
है महिमा इस रस अमृत की
“मोहन” जागी उमङ्ग मन की

सूर्य में प्रखर प्रकाश की व्याप्ति
चाँद की भोली-मीठी हाँसी
स्वर्ण-जड़ित उषा की लाली
सान्ध्य सेन्दूर है रङ्गबिरङ्गी
“मोहन” जागी उमङ्ग मन की

पत्ते बूटे डालें न्यारी
पक्षी करते हैं किलकारी
सोम में डूबी सृष्टि सारी
सात्विक स्वेद है दूर है विरति
“मोहन” जागी उमङ्ग मन की

विश्व ने डाले हृदय में डेरे
घास-पत्तियाँ रोंगटे मेरे
विश्व गुञ्जार में हृद-वीणा-स्वर
तान माधुरी हृदय में उठती
“मोहन” जागी उमङ्ग मन की
मीठी सी गुञ्जार है किसकी?
मेरा हृदय-मन छलक रहा है
तरुण तरङ्ग है करुणानिधि की
“मोहन” जागी उमङ्ग मन की

ओ३म् आविशन्कलशꣳ सुतो विश्वा अर्षन्नभि श्रियः ।
इन्दुरिन्द्राय धीयते ॥४८९॥
सामवेद 489
ओ३म् आ॒वि॒शन्क॒लशं॑ सु॒तो विश्वा॒ अर्ष॑न्न॒भि श्रिय॑: ।
शूरो॒ न गोषु॑ तिष्ठति ॥
ऋग्वेद 9/62/19

रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई