प्रेम से मिल कर चलो
सं ग॑च्छध्वं॒ सं व॑दध्वं॒
सं वो॒ मनां॑सि जानताम् ।
दे॒वा भा॒गं यथा॒ पूर्वे॑
संजाना॒ना उ॒पास॑ते ॥
(ऋग्वेद 10/191/2)
पद्यानुवाद
प्रेम से मिल कर चलो,
बोलो सभी ज्ञानी बनो
पूर्वजों की भांति तुम,
कर्तव्य के मानी बनो
सं ग॑च्छध्वं॒ सं व॑दध्वं॒
सं वो॒ मनां॑सि जानताम् ।
स॒मा॒नो मन्त्र॒: समि॑तिः समा॒नी
स॑मा॒नं मन॑: स॒ह चि॒त्तमे॑षाम् ।
स॒मा॒नं मन्त्र॑म॒भि म॑न्त्रये वः
समा॒नेन॑ वो ह॒विषा॑ जुहोमि ॥
(ऋग्वेद 10/191/3)
पद्यानुवाद
हों विचार समान सबके
चित्त मन सब एक हों
ज्ञान देता हूँ बराबर
भोग्य पा सब नेक हों
सं ग॑च्छध्वं॒ सं व॑दध्वं॒
सं वो॒ मनां॑सि जानताम् ।
स॒मा॒नी व॒ आकू॑तिः
समा॒ना हृद॑यानि वः ।
स॒मा॒नम॑स्तु वो॒ मनो॒
यथा॑ व॒: सुस॒हास॑ति ॥
(ऋग्वेद 10/191/4)
पद्यानुवाद
हों सभी के दिल तथा
संकल्प अविरोधी सदा
मन भरे हों प्रेम से
जिससे बढ़े सुख सम्पदा
सं ग॑च्छध्वं॒ सं व॑दध्वं॒
सं वो॒ मनां॑सि जानताम् ।
सं ग॑च्छध्वं॒ सं व॑दध्वं॒
सं वो॒ मनां॑सि जानताम् ।
सं ग॑च्छध्वं॒ सं व॑दध्वं॒
सं वो॒ मनां॑सि जानताम् ।
उपर्युक्त स्वर/लय में नीचे के पद को भी गया जा सकता है :–
संस॒मिद्यु॑वसे वृष॒न्नग्ने॒
विश्वा॑न्य॒र्य आ ।
इ॒ळस्प॒दे समि॑ध्यसे॒
स नो॒ वसू॒न्या भ॑र ॥
(ऋग्वेद 10/191/1)
पद्यानुवाद
हे प्रभो ! तुम शक्तिशाली
हो बनाते सृष्टि को
वेद सब गाते तुम्हें हैं,
कीजिये धन वृष्टि को










