हे जगदीश्वर !! तुम ‘पुरुषाक’ हो
हे जगदीश्वर !! तुम ‘पुरुषाक’ हो
हो सर्वशक्तिमान् !
प्रज्ञा और क्रिया दोनों में
रहते सदा विद्यमान्
हे जगदीश्वर !! तुम ‘पुरुषाक’ हो
हो सर्वशक्तिमान् !
होती हैं दूध धाराएँ सञ्चरित
जैसे इन गौओं के थनों से
वैसे प्रभु की पोषण और
कल्याण शक्तियाँ बरसे युगों से
बाँधा प्रभु ने हमें नियमों में
जिससे बने ऋतवान्
हे जगदीश्वर !! तुम ‘पुरुषाक’ हो
हो सर्वशक्तिमान् !
नियमों के बन्धन हैं हितकारक
करते बलवान् सदा ही
सत्य-नियम हैं अति सुखकारक
बसे भगवान् मेधावी
प्राप्त करें प्रभु की शक्तियाँ
बनें सुकर्मी प्रज्ञावान्
हे जगदीश्वर !! तुम ‘पुरुषाक’ हो
हो सर्वशक्तिमान् !
हे जगदीश्वर !! तुम ‘पुरुषाक’ हो
हो सर्वशक्तिमान् !
प्रज्ञा और क्रिया दोनों में
रहते सदा विद्यमान्
हे जगदीश्वर !! तुम ‘पुरुषाक’ हो
हो सर्वशक्तिमान् !
हो सर्वशक्तिमान् !
हो सर्वशक्तिमान् !
ओ३म् शची॑वतस्ते पुरुशाक॒ शाका॒ गवा॑मिव स्रु॒तय॑: सं॒चर॑णीः ।
व॒त्सानां॒ न त॒न्तय॑स्त इन्द्र॒ दाम॑न्वन्तो अदा॒मान॑: सुदामन् ॥
ऋग्वेद 6/24/4
रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई










