ऐ आर्यो ! करो आत्मोन्नति

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ऐ आर्यो ! करो आत्मोन्नति

ऐ आर्यो ! करो आत्मोन्नति
निज श्रेष्ठ कर्म के द्वारा
आत्मरति सदा पाते रहो
शतवर्ष हो जीवन तुम्हारा

रहो दूर विकर्मों से
सुकर्म से जीवन जीओ
विषय-भोग का त्याग करो
पालन ईशाज्ञा करो
मोह त्याग दो विषय का
अपनी ही कर्तव्य बुद्धि के द्वारा
ऐ आर्यो ! करो आत्मोन्नति
निज श्रेष्ठ कर्म के द्वारा

परधन का लोभ ना कर
धन पूजित अर्जित कर
सत्कर्म हो जीवन भर
हो पाप-दुरित का डर
भगवान् की आज्ञा पर
हो निष्काम तेरा जीवन सारा
ऐ आर्यो ! करो आत्मोन्नति
निज श्रेष्ठ कर्म के द्वारा

होगी(ती) जब पूर्ण इच्छा
जागता है मन में हर्ष
यदि पूरी नहीं होगी
दु:ख करता हृदय को स्पर्श
यह प्रमाद-विषाद मिले
तुझको केवल इस बन्धन के द्वारा
ऐ आर्यो ! करो आत्मोन्नति
निज श्रेष्ठ कर्म के द्वारा

ना लिप्त हो बन्धन में
आनन्द प्रभु का ले
जो सुक्षेत्र बने मन-देह
सत्कर्म के धारण से
बन्धन से मुक्त जीवन का
सफर कर ले सत्कर्म द्वारा
ऐ आर्यो ! करो आत्मोन्नति
निज श्रेष्ठ कर्म के द्वारा
आत्मरति सदा पाते रहो
शतवर्ष हो जीवन तुम्हारा

ओ३म् कु॒र्वन्ने॒वेह कर्मा॑णि जिजीवि॒षेच्छ॒तᳪ समा॑: ।
ए॒वं त्वयि॒ नान्यथे॒तो॒ऽस्ति॒ न कर्म॑ लिप्यते॒ नरे॑ ।। २ ।।
यजुर्वेद 40/2

रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई