सत्य धर्म की राहों पर क्यों तुमने चलना छोड़ दिया

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सत्य धर्म की राहों पर क्यों तुमने चलना छोड़ दिया

सत्य धर्म की राहों पर क्यों
तुमने चलना छोड़ दिया
परम पिता परमेश्वर से क्यों
तुमने नाता तोड़ लिया

इतनी उम्र बिता दी तुमने
घर गृहस्थी के झमेलों में
फिर भटकते सुख की खातिर
नौटंकी और मेलों में
इस दुनिया के चकाचौंध में
सारा जीवन छोड़ दिया
सत्य धर्म की राहों पर क्यों
तुमने चलना छोड़ दिया
परम पिता परमेश्वर से क्यों
तुमने नाता तोड़ लिया
सत्य धर्म की राहों पर क्यों
तुमने चलना छोड़ दिया

काशी देखी, मथुरा देखी
सारे तीरथ देख लिए
मन्दिर मस्जिद गिरिजा देखी
और गुरुद्वारे देख लिए
कहीं न मन की प्यास बुझी
और कहीं नहीं भगवान् मिला
सत्य धर्म की राहों पर क्यों
तुमने चलना छोड़ दिया
परम पिता परमेश्वर से क्यों
तुमने नाता तोड़ लिया
सत्य धर्म की राहों पर क्यों
तुमने चलना छोड़ दिया

अगर चाहे खुशियाँ मन की
तो कुछ ऐसे काम करो
दीन-दुखियों की सेवा कर लो
और बड़ों का मान करो
सत्-पुरुषों की संगत में क्यों
आना-जाना छोड़ दिया
सत्य धर्म की राहों पर क्यों
तुमने चलना छोड़ दिया
परम पिता परमेश्वर से क्यों
तुमने नाता तोड़ लिया
सत्य धर्म की राहों पर क्यों
तुमने चलना छोड़ दिया

जीवन श्रेष्ठ बनाना है तो
तुम अच्छा साहित्य पढ़ो
सारे भ्रम मिट जाएँगे जो
तुम सत्यार्थ-प्रकाश पढ़ो
सत्य की खातिर दयानन्द ने
जीवन का बलिदान दिया
सत्य धर्म की राहों पर क्यों
तुमने चलना छोड़ दिया
परम पिता परमेश्वर से क्यों
तुमने नाता तोड़ लिया
सत्य धर्म की राहों पर क्यों
तुमने चलना छोड़ दिया

सत्य मार्ग पर चलने में कुछ
ऐसे क्षण भी आयेंगे
काम-क्रोध और लोभ-मोह भी
अपना जाल बिछायेंगे
कहे “सरोज” प्रभु-भक्ति में
जो लगा वो जीत गया
सत्य धर्म की राहों पर क्यों
तुमने चलना छोड़ दिया
परम पिता परमेश्वर से क्यों
तुमने नाता तोड़ लिया
सत्य धर्म की राहों पर क्यों
तुमने चलना छोड़ दिया

रचनाकार :- श्रीमती सरोज बाल वर्मा