देह की देहरी के पुजारी सभी

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देह की देहरी के पुजारी सभी

देह की देहरी के पुजारी सभी,
प्राण का कोई सेवक मिला ही नहीं ।
भावनाएँ कुँवारी रहीं आज तक,
पर कोई पाणिग्राहक मिला ही नहीं ।

कामनाएँ पुरस्कृत हुईं पाप की,
वासनाओं को वरदान मिलता रहा ।
प्रार्थनाएँ अभागिन रहीं उम्र भर,
वेदनाओं को अपमान मिलता रहा ।

चाहती थी कि सिन्दूर मन को मिले,
किन्तु कोई समर्थक मिला ही नहीं ।
देह की देहरी के पुजारी सभी,
प्राण का कोई सेवक मिला ही नहीं ।

प्रेम तो आज चौसर का इक खेल है,
द्रौपदी देह की ही पुरस्कार है,
हैं शकुनि जीतते दांव पर दांव भी,
पुण्य के पाण्डवों की हुई हार है ।

काम पथ के तो साथी हज़ारों मिले ,
भाव पथ का प्रवर्तक मिला ही नहीं ।
देह की देहरी के पुजारी सभी,
प्राण का कोई सेवक मिला ही नहीं ।

कामना के दशानन हैं चहुँ ओर ही,
हाय कैसे बचे उर की सीता कहो ।
पाप के पुण्य के इस छिड़े युद्ध में,
कौन हारा कहो, कौन जीता कहो ।

त्याग की उर्मिला आस में है मगर,
उसको लक्ष्मण सा साधक मिला ही नहीं ।
देह की देहरी के पुजारी सभी,
प्राण का कोई सेवक मिला ही नहीं ।