आत्म-सुदर्शी रस भरा देखा है सन्सार तेरा

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आत्म-सुदर्शी रस भरा देखा है सन्सार तेरा

आत्म-सुदर्शी रस भरा
देखा है सन्सार तेरा
अन्तर्मुख दृष्टि में
सृष्टि रस है खरा
आत्म-सुदर्शी रस भरा

पहले था सन्सार
मेरी लालच का कारण
अब पूजा का है स्थान
लोभ का हुआ निवारण
निष्काम यज्ञ का
भाव भी जाग पड़ा
आत्म-सुदर्शी रस भरा

पहले भोग स्थली थी
अब योगस्थली है पावन
विषय जो थे मनोहारी
(अब) मनीषी हुए मनभावन
सौंदर्य प्रभु का
है स्वाद, स्वाद वाले का
आत्म-सुदर्शी रस भरा

गन्ध परम गन्धी का
आया तो रोम-रोमांच बढ़ा
सद्भावों का सोम-कलश
भर-भर के उमड़ पड़ा
छलका कलश तो
प्रभु-प्रेमोद्गार बढ़ा
आत्म-सुदर्शी रस भरा

प्रभु-प्रेम गङ्गा में
हे इन्द्रानन्द ! विहार कर
मनीषियों सा हार्दिक
तू जन-गण से व्यवहार कर
इन्द्रियों का तू है
राजाध्यक्ष बड़ा
आत्म-सुदर्शी रस भरा

हृदय में तेरे इन्द्र
यह इन्दु चमक रहा है
वीर-नाद को सुन ले
भक्ति-रस सरस रहा है
अन्तर्मुख दृष्टि बने
विश्वामित्र खरा
आत्म-सुदर्शी रस भरा
देखा है सन्सार तेरा
अन्तर्मुख दृष्टि में
सृष्टि रस है खरा
आत्म-सुदर्शी रस भरा