माता गऊ माता, सुख की दाता
माता गऊ माता, सुख की दाता,
जन गण उतारें तेरी आरती।
सेवा करने से मिलती मेवा,
जन-जन को दुःख से उभारती ॥ टेक ॥
जो तेरे घृत से हवन
करे माँ होती दूर बीमारी।
समय-समय नभ जल वर्षा
ये भरना केसर क्यारी ॥
सारी दुनिया को मिलता अन्न,
खाकर मन हो प्रसन्न,
कहते माँ तुझको सच्चे भारती॥1॥ माता….
कपिला रेणुका सुरभी
नन्दनी कामधेनु तेरे नाम।
सुख की दाता, है गऊ माता,
कहता जगत तमाम॥
श्याम मोहन ने तुझे चराई,
यमुना तट बंशी बजाई,
बहती जहां निर्मल
जल की धारा थी॥2॥ माता…
वधका लिखा निषेध तेरी
रक्षा का वर्णन आता।
अन्तः काय गौ घातक
ऐसे यजुर्वेद बतलाता॥
गाथा ऋषियों मुनियों ने गाई,
करता जो तेरी सहाई,
उसके ही संकट टारती ॥3॥ माता….
सूखे तृण भूसा खाकर के
जो मीठा दूध पिलाती।
आश्चर्य है निर्दयिता से
फिर भी काटी जाती॥
छाती फटती नहीं गम से इनके,
बदले नहीं भाव मनके,
कर्मठ क्यों बन गये इतने स्वार्थी ॥4॥ माता…










