प्रभु को बिसार किसी की
प्रभु को बिसार किसी की,
आराधना करूं मैं ।
पा कल्प तरू किसी से,
क्या याचना करूं मैं ।।
अन्तरा – मोती मिला तुझे जब,
मानस के नाम सर में कंकड़ बटोरने की,
क्या चाहना करूँ मैं।। प्रभु को…।।
जग के परमपिता जब,
घर-घर में रम रहे हैं।
लघु जान क्यों किसी कि,
अबहेलना करूँ मैं ।। प्रभु को …।।
मुझको प्रकाश प्रीत पल,
आनन्द आन्तरिक है।
जग के क्षणिक सुखों को,
क्यों कामना करूँ मैं।। प्रभु को…।।










