मधुर वेद-वीणा बजाये चला जा

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मधुर वेद-वीणा बजाये चला जा

मधुर वेद-वीणा बजाये चला जा
जो सोते हैं उनको जगाये चला जा
कुकर्मों की कीचड़ में जो फँस रहे हैं
अविद्या अँधेरे में जो धँस रहे हैं
उन्हें सत्य पथ तू बताये चला जा ॥ १ ॥

निराकार प्रभु है सभी में समाया,
सभी फिर हैं अपने न कोई पराया
घृणा फूट मन से मिटाये चला जा ॥ २ ॥

जगत् युद्ध की ज्वाला में जल रहा है,
प्रबल चक्र अन्याय का चल रहा है
मनुजता जगत् को सिखाये चला जा ॥ ३ ॥

अखिल विश्व में भावना भव्य भर के,
स्व-कर्तव्य-उद्देश्य को पूर्ण करके तू
ऋषिराज का ऋण चुकाये चला जा ॥४॥

समझ के जो चन्दन लगा धूलि बैठे,
पड़े भ्राँति में नाम तक भूल बैठे उन्हें
आर्य फिर तू बनाये चला जा ॥ ५ ॥

प्रकाशार्य ग्रामों गली हाट घर में नगर-देश,
देशान्तरों विश्वभर में दयानन्द की जय
मनाये चला जा ॥ ६ ॥